सड़कें बननी चाहिएं सेंसर पेवर से

पर बन नहीं रहीं, असर दिखेगा बाद में निगम को

कपिल चड्ढा, पंचकूला। नगर निगम इन दिनों शहर में तीन बड़ी सड़कें बनवा रहा है। ये तीनों सड़कें करीब 21 करोड़ रुपए की लागत से बन रही हैं। खास बात ये है कि forwebतीनों सड़कें सेंसर पेवर से बननी चाहिए थीं, लेकिन बन रही रहीं। बन रही हैं तो साधारण पेवर से। लब्बोलुआब ये है कि सेंसर पेवर से बनने का जो फायदा शहर को होना था और साधारण पेवर से बनने का जो नुकसान शहर को होगा, कुछ समय बाद ही सामने आएगा।
जानकारी के अनुसार निगम ने जब तीनों सड़कों का ठेका दिया था तो साथ ही शर्त भी रखी थी कि सड़कें गुणवत्ता से बनें, इसके लिए सेंसर पेवर इस्तेमाल होगा। फायदा यह होगा कि सड़क में गड्ढे कितने भी लंबे-चौड़े या फिर सड़क का लेवल कैसा भी होगा, उसी हिसाब से पेवर अपने आप माल (प्रीमिक्स) डाल देगा। नतीजतन सड़क की मजबूती आॅटोमेटिकली सुनिश्चित हो जाएगी। लेकिन…अब साधारण पेवर से सड़कें बनाई जा रहीं, जोकि मैनुअली आॅपरेट किया जाता है। नतीजतन सड़कें बनने के कुछ अर्सा बाद सड़कों के लेवल में फर्क आने की गुंजाइश से इंकार नहीं किया जा सकता। यानी, बड़े व्हीकल जब इन सड़कों पर दौड़ेंगे तो भीतर बैठे लोगों को सड़क के लेवल में फर्क हल्के ‘झटकों’ के तौर पर साफ महसूस होगा।
सुपरवाइजरी स्टाफ भी बराएनाम-
नगर निगम ने तीनों सड़कें बनाने के लिए स्टाफ भी बहुत कम मुहैया कर रखा है। जानकारों का कहना है कि एक जूनियर इंजीनियर तो ठेकेदार के हॉटमिक्स प्लांट पर बैठना चाहिए जो हरेक टिप्पर में माल (प्रीमिक्स) भरे जाते वक्त गुणवत्ता को सुनिश्चित करे। मौके पर हरेक सड़क के लिए दो-दो जूनियर इंजीनियर होने चाहिएं, जो थोड़े-थोड़े अंतराल पर बिछाए गए माल (प्रीमिक्स) की गुणवत्ता को हाथ के हाथ जांचते जाएं।
बताना जरूरी है कि जिन तीन सड़कों को नगर निगम इन दिनों बनवा रहा है, करीब 7 साल के बाद बन रही हैं। इन सड़कों की फाइल करीब सवा साल तक निगम और अर्बन लोकल बॉडीज़ मुख्यालय में सरकारी फाइलों की धूल फांकती रही है। कायदे से सड़कें पांच साल बाद बन जानी चाहिए थीं, लेकिन नहीं बनीं। इनके लिए मेयर उपिंद्र आहलुवालिया ने काफी मशक्कत तो की ही, स्थानीय विधायक ज्ञानचंद गुप्ता ने भी जोर लगाया। उन्होंने सरकार को चिट्ठी लिखकर बताया कि बदहाल सड़कों की वजह से लोग परेशान और सरकार की साख खराब हो रही है।

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