Panchkula Special

सवाल: निगम दिखा रहा सपने और देख रहा शहर, पूरे भी होंगे?

-शहर में ट्रैफिक लाइटों की बदहाली जग-जाहिर है। इससे निगम की भी बदनामी हो रही है क्योंकि शहर में पहली बार आने वालों को लाइटें या तो टूटी/खराब मिलती हैं या फिर जहां जरूरत, वहां लगी हुई नहीं।
-बेहतर होता कि शहरवासियों का भरोसा जीतने के लिए निगम कोई एकाध काम ही पूरा करके दिखा देता। मसलन, एकाध बस क्यू शेल्टर पूरा तैयार कर देता या फिर कोई एक चौराहा।
– अभी तो वेंडिंग एक्ट के तहत रेहड़ी-फड़ी वालों को एडजस्ट कर शहर को एन्क्रोचमेंट-फ्री बनाने का ‘पहाड़’ जैसा काम भी सिरे चढ़ाना है।

कपिल चड्ढा, पंचकूला। नगर निगम आॅफिस से आए दिन नई-नई बातें सुनने-पढ़ने को आ रही हैं। कभी सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क बिछाने तो कभी एयर कंडीशंड बस क्यू शेल्टर बनाने। कभी चौराहों को नए सिरे से और आकर्षक बनाने, तो कभी शहर की सभी एंट्रीज़ पर एंट्री गेट्स बनाने की बातें। और तो और, कचरे/गारबेज के डस्टबिन्स अंडरग्राउंड करने और कपड़े धोने के लिए वॉशिंग एरियाज़ बनाने की बातें।
इसी तरह और कई लोक-लुभावन बातें भी बाहर लोगों तक आ रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि शहर कहीं मुंगेरी लाल के हसीन सपने तो नहीं देख रहा। वजह साफ है कि अब तक जो भी स्कीमें जन-साधारण तक पहुंची हैं, निगम आॅफिस के स्तर पर प्लान की गई हैं। यानी, जब तक ‘साहेब’ हैं, तब तक बखूबी काम चलेगा और साहेब के ट्रांसफर बाद हश्र क्या रहेगा, यह भी बड़ा सवाल है।
जगजाहिर है कि निगम आॅफिस बहुत थोड़े समय और अमले के साथ बहुत बड़े-बड़े काम सिरे चढ़ाने की बातें कर रहा है। बातें तो यहां तक सामने आई हैं कि सफाई कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने के लिए कुछ दिन के लिए हैदराबाद भेजा जाएगा। कचरा/गारबेज बीनने वाले इन दिनों ट्रेनिंग पर बेंगलुरू में हैं। हैरत की बात ये है कि कचरा/गारबेज बीनने वाले न तो सरकारी मुलाजिम हैं और न ही शहर के स्थाई बाशिंदे।
और तो और, कचरा/गारबेज बीनना भी किसी का स्थाई काम/पेशा नहीं होता। यह तो दिहाड़ी कमाने जैसा काम/पेशा है। ऐसे में कचरा/गारबेज बीनने वाले क्या ट्रेनिंग लेंगे और क्या रिजल्ट देंगे। इसी तरह सफाई कर्मचारियों की ट्रेनिंग को लेकर भी बड़ा सवाल है।
निगम आॅफिस की कार्यशैली पर बड़ा सवाल इसलिए भी उठ रहा क्योंकि अब तक नए बस क्यू शेल्टर्स बनाने का जो काम हाथ में लिया गया, रिजल्ट बहुत थोड़ा मिला है। पिछले कई दिनों से मौके पर काम ‘बंद’ पड़ा है। लोगों का कहना है कि एकसाथ
कई बस क्यू शेल्टर्स बना देने का सपना दिखाने की बजाय पहले एकाध ही पूरी तरह से तैयार कर देते। इसी तरह कई चौराहों के नवीनीकरण का काम एक साथ शुरू करने की बजाय पहले एकाध को ही नए रूप में पेश कर देते। अब जिस तरह से ताबड़तोड़ काम गिनाए जा रहे और शुरू करने की कवायद चल रही है, डर है कि कहीं शहर ने जो सपने देखे, सपने ही न रह जाएं। सवाल ये भी है कि सरकारी सेवा में किसी की भी पोस्टिंग परमानेंट या लंबे समय के लिए नहीं रहती। ऐसे में ट्रांसफर के बाद क्या रहेगा?
सवाल जायज है। सोचे गए काम तो लंबे चलने ही हैं। हरेक अफसर का सोचने व काम करने का अंदाज अलग-अलग होता है। जरूरी नहीं कि अबके अफसर जो शहर को देखना/बनाना चाहते, आगे आने वाले अफसर भी वैसा ही सोचें और करें।