Panchkula Special

निगम: कागजी ज्यादा और ग्राउंड पर कम

पेश है लेखा-जोखा निगम के कामकाज का, अफसर भले कुछ भी कहें

लोकेश चड्ढा, पंचकूला। नगर निगम शहर में पब्लिक से जुड़े कामों को सरअंजाम देने में ‘फिसड्डी’ साबित हुआ है। सिवा स्ट्रीट लाइट्स के अन्य सेवाओं में लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। अफसर अपनी पीठ थपथपाते हुए ‘सीनियर्स’ के सामने भले कुछ भी कहें।
लब्बोलुआब यह है कि निगम कागजी ज्यादा और ग्राउंड पर कम दिखाई देता है। यही वजह है कि सड़कों को लेकर निगम की किरकिरी तो हो ही रही, एन्क्रोचमेंट के मामले में बेवजह स्थानीय विधायक ज्ञानचंद गुप्ता तक को लपेटे में ले लिया गया, जबकि उनका निगम के कामकाज में सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है।
निगम वेंडर पॉलिसी बनाने में बहुत धीमी चाल चल रहा है। इसी पॉलिसी के अभाव में शहर में एन्क्रोचमेंट का ग्राफ आए दिन बढ़ रहा है। एन्क्रोचर्स को न तो निगम का स्टाफ काबू कर रहा और न ही हुडा का। दूसरे शब्दों में, एन्क्रोचर्स पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से मिली ‘स्टे’ की आड़ में सरकारी व निजी मिल्कियत की जमीनों पर कब्जे किए जा रहे और संबंधित महकमे चुप हैं।
जबकि हकीकत यह है कि हाईकोर्ट से स्टे चुनिंदा लोगों को मिली और उनकी आड़ में एन्क्रोचर्स सैकड़ों की तादाद में नए भी जुड़ गए हैं। इन्हें न तो निगम रोक रहा और न ही हुडा।
आंकलन आवारा कुत्तों की न्यूसेंस पर किया जाए, निगम यहां भी फिसड्डी साबित हो रहा है। शहर का कोई सेक्टर ऐसा नहीं, जहां आवारा कुत्तों की तादाद कम हो रही हो। भले ही सरकारी कागजों में स्टर्लाइजेशन का काम बखूबी हो रहा होगा, लेकिन ग्राउंड पर आवारा कुत्तों की तादाद आए दिन बढ़ रही, जो राह चलतों को काटने को दौड़ते हैं। पालतू कुत्तों का रजिस्ट्रेशन भी कागजी साबित हो रहा है। यूं तो निगम बने को चार साल बीत चुके, लेकिन पालतू कुत्तों के रजिस्ट्रेशन को लेकर अब संजीदगी दिखाई जा रही है, वह भी कागजी तौर पर।
शहर में कितने पालतू कुत्ते और इनमें से कितने एंटी रैबीज का वैक्सीन लगवाए हुए, निगम के पास कोई आंकड़ा नहीं है। अब निगम भले ही जुर्माने का डरावा दिखा रहा, लेकिन हकीकत यही है कि शहर के लोग निगम की कार्यशैली को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते हैं। वजह भी साफ है कि न तो निगम का कामकाज संतोषजनक और न ही पर्याप्त स्टाफ की मौजूदगी के चलते निगम की ग्राउंड पर पे्रजेंस। लिहाजा, सिवा हाउस/प्रॉपर्टी टैक्स भरने के शहर के लोग निगम को गंभीरता से नहीं लेते। आवारा कुत्तों की तर्ज पर आवारा गऊओं पर शिकंजा कसने के नाम पर भी निगम का रिपोर्ट कार्ड संतोषजनक नहीं है। इसी तरह की कई और सेवाएं देने में निगम अपेक्षा पर खरा नहीं उतर रहा है। यही वजह है कि कई पार्षद भी निगम के अफसरों से खफा हैं क्योंकि उन्हें अपने वार्ड के लोगों के सामने जवाब देने मुश्किल हो रहें हैं। खासकर सड़कों की हालत और आवारा कुत्तों पर नकेल कसने के मामले में निगम की रिपोर्ट ज्यादा अच्छी नहीं। कुत्ते कई लोगों को काट चुके हैं, बावजूद इसके निगम के अफसर कुत्तों पर शिकंजा कसने के मामले में बहुत लाइट मूड से काम कर रहे हैं। इसी तरह एन्क्रोचमेंट के मामले में निगम का रवैया बहुत ढीला है। लोग चाहते हैं कि शहर साफ-सुथरा रहे पर ऐसा हो नहीं रहा। वजह साफ है कि एन्क्रोचमेंट हटाने के मामले में निगम ढीला है।