Panchkula Special

करोड़ों के काम कॉन्ट्रैक्ट बाबुओं को …और विभागीय बाबू साइड लाइन

 

   निगम के अफसरों से सवाल: कॉन्ट्रैक्ट अवधि के बाद कौन होगा जवाबदेह?

कपिल चड्ढा, पंचकूला। नगर निगम पंचकूला  की कार्यशैली संदेह के घेरे में है। मसला रिटायर्ड बाबुओं को कॉन्ट्रैक्ट बेस पर सर्विस में लेने का है। आलम यह है कि अफसरों के मनमाने रवैये के चलते करोड़ों रुपए के काम  तो रिटायर्ड बाबुओं को सौंप रखे और विभाग के अपने बाबू साइडलाइन हैं।

सवाल इस बात का है कि रिटायर्ड बाबू सीमित अवधि के लिए कॉन्ट्रैक्ट बेस पर लिए गए हैं। इनका सेवाकाल पूरा होने के बाद इनके कराए कामों के लिए जिम्मेदार कौन बनेगा। यानी, जो काम ये बाबू करवा रहे, इनमें कमी-पेशी जो भी होगी, उसके लिए निगम से जिम्मेदार कौन रहेगा। जाहिर है कि सेवाकाल पूरा होने के बाद कोई भी शिकायत सामने आने पर किसी को न तो घर से बुलाया जा सकता और न ही कोई आता है।

सवाल यह भी है कि रिटायर्ड बाबू के कराए काम पर अगर कोई जांच बैठती है तो क्या  वह जांच में सहयोग करेगा। जांच में दोषी पाया गया तो भरपाई कैसे होगी, क्योंकि वह तो रिटायर्ड है। यहां बताना जरूरी है कि सरकारी सेवा में रहते हुए कोई बाबू अगर गलती करता है तो सरकार वेतन तो रोक ही सकती, पेंशन तक भी रोक लेती है। जाहिर है कि सेवाकाल में बाबुओं की जवाबदेही ज्यादा रहती, जोकि रिटायर्ड बाबुओं के मामले में संदेह के घेरे में है।

एक सवाल यह भी उठता है कि नगर निगम ने जिन रिटायर्ड बाबुओं को काम पर ले रखा है, क्या इनकी परफॉर्मेंस के बारे में इनके मूल विभाग से लिखती तौर पर कोई दस्तावेज ले रखा है। यानी, संबंधित बाबू की कार्य-कुशलता के बारे में निगम के पास कोई सुबूत है क्या।

पंचकूला सिटी न्यूज7  निगम के अफसरों के ध्यान में ला रहा कि हो सकता है, जिस बाबू को निगम से जो काम मिला हुआ, वह बाबू उस काम की अपने मूल विभाग में रहते अच्छी परफॉर्मेंस नहीं दे पाया हो। ऐसे में निगम को अच्छी परफॉर्मेंस मिलने पर सवालिया निशान लगना और निगम की  कार्यशैली पर अंगुली उठना किसी हद तक बनता ही है।

दूसरी तरफ, निगम में काम कर रहे अर्बन लोकल बॉडीज़ विभाग के अपने बाबू साइडलाइन हैं। यानी, निगम से जो काम मिला हुआ, महज कामचलाऊ, जबकि मूल विभाग से होने के चलते उनकी जवाबदेही ज्यादा पुख्ता है, लेकिन अफसरों की ‘मर्जी’ के आगे चल नहीं पा रही।

यह ठीक है कि किसी भी बाबू से क्या काम लेना, यह संबंधित विभाग के मुखिया का विशेषाधिकार होता है, लेकिन पब्लिक मनी के मिसयूज को रोकने के जिम्मेदारी के मद्देनजर यह सुनिश्चित करना भी मुखिया की ही जिम्मेदारी बनता है कि जिस बाबू से जो काम लिया जाए, उसके रिजल्ट्स बेहतरीन मिलने चाहिएं। कोई शिकायत नहीं रहनी चाहिए और अगर शिकायत मिलती है तो संबंधित बाबू की जवाबदेही तय करते हुए उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का ‘खाता’ भी खुला रहनाचाहिए। वर्ना… सरकारी खजाने से खर्च किए गए पैसे का मिसयूज संभव और इसकी जवाबदेही उस मुखिया की बनती है जिसने बिना दूरगामी परिणामों का आंकलन करते हुए जल्दबाजी में काम सिरे चढ़वा लिए।